उम्मीद के गलियारों से ….

उम्मीद के गलियारों से ,
आवाज़ लगाते हैं सपने,
बड़ा शोर मचाते है सपने ।
कोई इनसे कह दो थम जाए,
क्यूँ पीछा करते रहते हैं,
मेरे दर्द को सींचां करते हैं ।
यह टहनी अब वटव्रक्ष हुई ,
सीने में चुभती है जैसे सुई ,
ऐ मेरे खुदा ,कर इतना करम,
अब झूम के सावन आ जाए ,
इन शाख़ों को महका जाए,
अब पतझड़ में भी गुल खिल जाए,
खव्वाबो को मंज़िल मिल जाए…..२


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