है ये मेरा मन…..

है ये मेरा मन
अपनी ही धुन मे मग्न….
ना किसी का पता
ना किसी की लग्न….
एक आग है इसमें
है कुछ ऐसी अग्न…..
है धुँआँ ही धुँआँ
जैसे हो कोई हवन…..
शीतल करने का मैं
करूँ लाख जतन….
रिम झिम बरसे चाहे
सौ सौ सावन…,,,
या झर झर बरसे
ये मेरे दोनो नयन….
बुझती ही नही
इस मन की जलन ….

ऊपरवाले ..इक बार तू
आकर कर ले मिलन….
तू कुछ कम कर दे
इस मन की तपन…..
तुझ से मिल कर
मैं हो जाऊँ चन्दन ….
महके बगिया सा
मेरे मन का ये वन …
ख़ुशियों से भर दे
तू मेरा दामन …
अर्पण है तुझको
ये मेरा जीवन …..२


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