Category: Poem

जिंदगी का ये कारवॉं ……

जिंदगी का ये कारवॉं कभी रूका नही आगे ही ये बढ़ता रहा कभी थका नही ये चलता रहा,ये कभी थमा नही …. दिल मे उम्मीद के रोशन कर चिराग़ नये हौंसलों के जला कर मशाल ये चलता रहा,ये कभी थमा नही ..,. राह मे तो आयेंगें…

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रात को तकिये तले ….

एक टुकड़ा ऑंस्मॉं ..,और कुछ टूटे हुए तारे मिले रात को तकिये तले …. कुछ अधुरी ख्वाईशें ..और कुछ टूटे हुए ख़्वाब मिले रात को तकिये तले…. बातें हैं कुछ अनकही…और अनसुने से कुछ अल्फ़ाज़ मिले रात को तकिये तले …. धीमी सी कुछ सिसकियाँ ..और…

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है ये मेरा मन…..

है ये मेरा मन अपनी ही धुन मे मग्न…. ना किसी का पता ना किसी की लग्न…. एक आग है इसमें है कुछ ऐसी अग्न….. है धुँआँ ही धुँआँ जैसे हो कोई हवन….. शीतल करने का मैं करूँ लाख जतन…. रिम झिम बरसे चाहे सौ सौ…

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हसरतें…….

हसरतें इतनी है कि उनका बोझ हमसे उठाया न गया … तुम तो छोड़ कर चल दिये ज़ालिम पर तुम्हें छोड़ कर हमसे ही जाया न गया… तरसता रहा ये दिल मेरा,दिल की आवाज़ सुनने को पर एक बार भी तुम से मुझे बुलाया न गया…

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मॉं …मै तेरी परछाईं हूँ ……

मॉं …मै तेरी परछाईं हूँ भले ही आज पराई हूँ पर तेरी ही जाईं हूँ मॉं मैं तेरी परछाईं हँ … तेरी गोद मे बचपन बीता खेले खाये बड़े हुये मासूम लड़कपन के वो दिन माँ मैं अब तक भुला न पाई हूँ …. मॉं .,मैं…

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जो भी है तेरे अपने …

जो भी है तेरे अपने ,तेरे आस पास है, ऐ दिल ,ना जाने फिर भी तुझे किसकी तलाश है। बादल बरस रहे हैं,आँखें बरस रही हैं, बुझती नही है फिर भी ना जाने कैसी प्यास है।

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जब आसमां….

जब आसमां खुद ही उतर कर आ गया ज़मी पर किसको पडी है चांद और सितारों को कोई ठूंठे सब कुछ सिमट कर आ गया इक शकसियत मे तेरी किसको पडी हैं जन्नत के नज़ारो को कोई ठूंठे । रूह को महका रही है खुशबु तेरी…

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रिश्तों की दहलीज़ पर ….

रिश्तों की दहलीज़ पर बैठे रहे हम उम्र भर, खिड़की खुलेगी बस अभी आयेगा हम तक कोई कभी, ऐसा मगर कभी हुआ नही सूनी रही दिल की ज़मीं , सूना रहा मेरा आॉंस्मां कोई चॉंद बन कर छाया ही नही उसे प्यार मुझ पर आया ही…

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तेरी इक नज़र पे वार दूँ

तेरी इक नज़र पे वार दूँ कायनात मैं सारे जहाँन की। मंदिर है दिल मेरा दिल नही महज़ बात हैं पहजान की । जुर्रत तो ज़र्रे वफ़ा की देखिये इसे ख्वाईश है आसमान की। आफ़ताब कहे,माहताब कहे तौफीक है क़द्र दान की।

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उम्मीद के गलियारों से ….

उम्मीद के गलियारों से , आवाज़ लगाते हैं सपने, बड़ा शोर मचाते है सपने । कोई इनसे कह दो थम जाए, क्यूँ पीछा करते रहते हैं, मेरे दर्द को सींचां करते हैं । यह टहनी अब वटव्रक्ष हुई , सीने में चुभती है जैसे सुई ,…

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